हर कोई विषपान कर रहा है ...
किसी के गले अकेलेपन का विष उतर रहा है ...सीने में ..
कोई भीड़ में गुमशुदा है अपनों के चाह में ..
कही लम्हा भरी प्यार में तो ...
कही ..कई मुश्किल दरमियान लम्हों में ...
कौन शिव कौन स्वयंभू ...??मालूम नहीं ..
बस विषपान किये जारहेन है सब ...
कहीं धुवें में खुली हवा की चाहत का गला घुट रहा ...
कहीं बच्चों के हाथों से बचपन चूतराहा
किसी के हथेली में लकीरों के शिव कुछ ख़ास नहीं ..
कहीं सब कुछ होक भी ...अपनों के साथ नहीं ...
अजब दुनिया है चुप के चुप के आह भरे
और मुँह से न कुछ कह पाए .......
मजबूरी भी अब मजबूर सी लगती है ....
हर कोई शिव बन गया है ...विष पान कर रहा ....
कौन मृत्युंजय ...कौन मृत ...
ज़िन्दगी को भी ज्ञात नहीं ....
हर कोई विष पान कर रहा है ................
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