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Anjay
Thursday, August 13, 2009
हमसफ़र...
इस उम्मीद से जीए जा रहा हूँ...
एक दिन
ज़िन्दगी
आएगी कभी।
दस्तक देगी मेरे दिल क दरवाजे को
मुझसे कहेगी ये ज़िन्दगी...
क्या मैं बन सकती हूँ तुम्हारी
हमसफ़र...
1 comment:
Sudeep Dwary
August 14, 2009 at 12:57 PM
बोहोत खूब .....
ऐसा ही एक वादा ज़िन्दगी ने मुझसे भी किया था ... हम भी इसी गाफिली में जीते रहे ....
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रफ़्तार
फासले....
कुछ दूर हमारे साथ चलो...
नदी के बहाव को मोड़ने चला था मैं...कुछ अलग करने की...
हमसफ़र...
तुम मेरी तालाश हो...
मेरी कविता...
आइना तस्वीर क्यूँ नही...
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Anjay
Unknown
बोहोत खूब .....
ReplyDeleteऐसा ही एक वादा ज़िन्दगी ने मुझसे भी किया था ... हम भी इसी गाफिली में जीते रहे ....