Sunday, August 16, 2009

तरंग

एक शांत तालाब-सी है ये ज़िन्दगी...
अचानक-से एक पत्थर का टुकडा
ज़ोरदार आवाज़ से...
इसमें विलीन होता हुआ।
तालाब की स्थिरता को चीरकर...
हलचल मचा रहा।
एक बुलबुले-सी पानी की बूँदे...
अपनी सतह को छोड़,
फ़िर से अपने में समाती हुई.
ख़ुद से लड़ती तरंगे...
किनारे की तालाश में।
किनारे मिलते ही...
फ़िर से एकबार तालाब शांत और स्थिर.

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