Thursday, August 13, 2009

रफ़्तार

जिंदगी रुको जरा...
बड़ी तेज़ तेरी रफ़्तार है।
दौड़ती सड़कों में...
तू भी चला जा रहा है...क्यों?

तेरे साथ चलकर जाना मैंने...
जिंदगी फूलों का सेज नहीं
फ़िर भी अनजाने में... हर कदम पे तू...
काँटे ही बिछा रहा है क्यों?

तू भी थकता होगा कभी...
दो-चार गरम सांसे भरकर ।
थम जा ठहर जा कुछ पल के लिए...
फ़िर साथ तेरे में चलता हूँ।
कहीं ऐसा ना हो तुझ संग भी...
तनहा अकेला तू रह जाए.

मैं हारना नहीं चाहता तुझसे...
तुझसे मेरा संगर्ष नहीं।
बस...हमसफ़र बन जाओ तुम,
और साथ हमारे आओ तुम।

मैं नहीं कहता तुम्हारी धाराओं को...
रुक जाओ और बन जाओ तालाब।
पर ये भी तो अच्छी बात नहीं...
डूबकर तुझसे मैं बहता लाश बनूँ।

मैंने देखा तेरे हर रंगों को...
और नई परिभाषा तेरी बनाई है।
तस्वीर बनाने दे तेरी...
तुझे रफ़्तार तेरी बतानी है।

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