मैं ही तामस .....
और मुझसे ही है रोशन ये जहाँ ,
तुझमें हूँ धड़कन बन मैं पल -पल ,
फिर भी न जाने क्यों ढूंढे तुम ,
इधर -उधर , हर दिन और हर पल ।
हर क्षण तो करता है अनुभव
जल कण रवि आकाश पवन
फिर भी मृग बन घूमे तू वन -वन्न
स्वयं में न ढूंढे तू जड़ जग चेतन ।
वंशी बजा हर बार मैं बोलूँ ...
लेकिन तू सुनता कहाँ है अंतर्मन ।
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