वो देखो आसमान... मूक लगता है पर सब देख रहा है चुपचाप। नया सवेरा हमें एक आस दिलाता है, अपनी भूल से सीख लेने को कहता है। और देता है दिल को फिर से मंजिल की ओर बढ़ते रहने की चाह। मंजिल दूर-दूर तक नज़र नहीं आती, आसमान ज़मीन से मिलकर कहता है... चले चलो...क्षितिज से दूर तो नहीं है वो। लोग मिलते हैं...साथ चलते हैं। कोई अपने से कोई पराये। लेकिन सबमें एक अनोखी बात...एक अलग कहानी। कोई संभला हुआ, कोई लड़खड़ता अपनी राह में चलता हुआ-सा, किसी की आँखों में मंजिल के नजदीक होने की चमक, या फिर कोई अलविदा कहता हुआ। कहीं तेज़ धुप तो कहीं छाव, फिर कहीं रिमझिम बूंदों में गीत, धुल से खेलता कहीं मदहोश पवन, तो फिर कर कर से मिलने की चाह मे बहती नदी। मुट्ठी भर आसमा को अपना बनाने... मैं भी चल रहा हूँ ज़िन्दगी के इस भीड़ में। जब थक जाता हूँ , आसमान अपने पंखो को फैलाकर कहता है... आराम कर ले राही...कुछ पल के लिए, फिर एक सुबह लाऊंगा रोशिनी-पुंज में बांधकार, चल पड़ना...फिर से अपनी सही दिशा की ओर।
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