Saturday, September 22, 2018

पतझड़

एक दास्ताँ याद आया है ....
मई गुज़र रहा था ...आड़ी..तिरछी पगडण्डियोंसे ..
हवा की आवारगी में उड़ते टूटे पत्ते को देखा मैंने ।
चाँद साँसे बाकी भी उसमे अभी ...
तड़प रहता साँसे थाम ..
फिर भी एक अजीब सा सुकून था उसकी आँखों में
जाने वो कुछ कहना चाहता था मुझे....
फिर दरख़्त की ओर इशारा करके,
अलविदा कह गया मुझे ।

कुछ दिनों बाद इन्ही रास्ते से गुज़र ..
दरख़्त के इन्ही टहनियों को देखा ,
रंग बिरंगे  तरुण पत्ते नज़र आये मुझे।.

मेरी गुत्थी अब सुलझ चुकी थी ..
और आँखे नाम थे मेरे ।।

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