तनहा रहनेकी यूं आदत सी हो गयी है ...
की अक्सर अपने परछाई से भी दर जाता हूँ मैं।
कई दफे आहट से भी शोर-सी लगती है ...
खामोश अन्डेरों में ढूंढता आसरा ये मन ।
चांदिनी से खुद को बचता हूँ ऐसे ...
चाँद तले दिल जलता हो मेरा जैसे ।
न सपने , न अपने और न ही कोई आशियाना ही ...
जाने मुद्दत हुई वक्त रूककर थम सा हाय हो जैसे ।
अब और नहीं रंजिश -ए-जिंदगी ,
एक बार मुस्कुरा दो फिर से ।
की अक्सर अपने परछाई से भी दर जाता हूँ मैं।
कई दफे आहट से भी शोर-सी लगती है ...
खामोश अन्डेरों में ढूंढता आसरा ये मन ।
चांदिनी से खुद को बचता हूँ ऐसे ...
चाँद तले दिल जलता हो मेरा जैसे ।
न सपने , न अपने और न ही कोई आशियाना ही ...
जाने मुद्दत हुई वक्त रूककर थम सा हाय हो जैसे ।
अब और नहीं रंजिश -ए-जिंदगी ,
एक बार मुस्कुरा दो फिर से ।
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