Saturday, September 22, 2018

जिंदगी मुस्कुरादो ...फिर से

तनहा रहनेकी यूं आदत सी हो गयी है ...
की अक्सर अपने परछाई से भी दर जाता हूँ मैं।

कई दफे आहट से भी शोर-सी लगती है ...
खामोश अन्डेरों में ढूंढता आसरा ये मन ।

चांदिनी से खुद को बचता हूँ ऐसे ...
चाँद तले दिल जलता हो मेरा जैसे ।

न सपने , न अपने और न ही कोई आशियाना ही ...
जाने मुद्दत हुई वक्त रूककर थम सा हाय हो जैसे ।

अब और नहीं रंजिश -ए-जिंदगी ,
एक बार मुस्कुरा दो फिर से ।

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