Friday, September 21, 2018

उनकी याद आई  और फिर ..
मैं खुद पे हँसा ...
जिन्हे हाटों की लकीरों में ढूढ़ा करते थे कभी ,
आज उनके क़दमों के निशाँ भी मिलते है नहीं ।

हम बेवफा कहें भी तो कैसे उनको
वफ़ा तो मैंने खुद से ही की नहीं ..
चाँद को पाने की हसरत में ,
झील में चांदिनी के अक्स से खुद को है बहलाया ।

टूट कर बहते किनारों में आशियाँ बनाया मैं ने ...
कभी डूबता रहा ...और कभी यूँही बहता ही रहा ।

आज जो सपनों ने हकीकत से रू ..ब..रू ..करवाया ...
तो मैं न वो शख्स रहा ...न ही ..दीवाना कहलाया ...

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